बुधवार, 23 मार्च 2011

विश्व वानिकी दिवस मनाया गया World Forestry Day

विश्व वानिकी दिवस मनाया गया World Forestry Day
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आज राजकीय वरिष्ट माध्यमिक विद्यालय अलाहर में विश्व वानिकी दिवस मनाया  गया इस उपलक्ष्य में  इको मार्च और गोष्टी का आयोजन किया गया, इमली इको क्लब के सदस्यों को सम्बोधित करते हुए क्लब प्रभारी दर्शन लाल विज्ञान अध्यापक ने बताया कि दुनिया भर में विश्व वानिकी दिवस प्रति वर्ष २१ मार्च को मनाया जाता है । सन् 1872 में अमेरिका के नेबरास्का में इसकी शुरूआत हुई, इस दिवस को मनाये जाने का सारा श्रेय जे-र्स्टीलंग मार्टिन को जाता है| इन्होने नेबरास्का में बड़ी संख्या में पौधे लगाए थे । इसके बाद इन्होंने अन्य निवासियों को फल-फूल, छायादार,पर्यावरण सरक्षंण और खुबसूरती हेतु पौधे लगाने की सलाह दी । उन्होंने सरकार को पौधे लगाने के लिए एक अलग विशेष दिन रखने के लिए राज़ी कर लिया । इस प्रकार तब से इस दिन विश्व वानिकी दिवस की शुरूआत हुई । प्रथम वानिकी दिवस पर एक लाख से ज्यादा पौधे लगाये गए, धीरे-धीरे पुरी दुनिया में यह दिवस एक महापर्व के रूप में मनाया जाने लगा ।
tec_wfd_21-03-11-1 इस अवसर पर एक इको मार्च किया गया इस रैली का संचालन सुनील कुमार और मनोहर लाल अध्यापको ने किया,क्लब सदस्यों ने पेड़ लगाओ पर्यावरण बचाओ के नारे लगा कर इस दिवस बारे जागरूकता संचार किया, इस अवसर पर एक गोष्टी भी की गयी जिस में अध्यापको ने क्लब सदस्यों को विश्व वानिकी दिवस और वनों के लाभों के बारे में बताया कि वनों से हमे आक्सीजन गैस मिलती है,वन वर्षा करवाने में सहायक हैं,वन भूमि कटाव रोकते है, वन,वन्य जीवों का आश्रय हैं,वन प्रदूषण दूर करते हैं और वनों से लकड़ी की प्राप्ती तो वनों का बहुत ही गौण लाभ है परन्तु मानव इस को ही सबसे बड़ा लाभ मान कर अंधाधुन्द वनों की कटाई कर रहा है जो कि धरती के लिए घातक है tec_wfd_21-03-11-4 उन्होंने बताया कि एक अनुमान है कि प्रति वर्ष १५ लाख हेक्टेयर वन कटते है । भारत की राष्ट्रीय वन नीति में कहा गया था कि देश एक-तिहाई हिस्से को हरा भरा वनों युक्त रखेंगे,लेकिन पिछले वर्षों में भू-उपग्रह के  चित्रों से पता चलता है कि है कि देश में 33 प्रतिशत के बजाय 13 प्रतिशत ही वन क्षेत्र रह गया है। क्लब प्रभारी एवं क्लब ग्रुप लीडर दिलबाग सिंह ने सभी क्लब सदस्यों के साथ विचार विमर्श कर के यह निर्णय लिया कि इस वर्ष जुलाई अगस्त में विद्यालय के खेल के मैदान में उचित जगहों पर फल-फूल ,छाया दार एवं औषधीय पेड़ पौधे लगाएं जाएँगे
इस अवसर पर सभी सदस्यों व अध्यापकों संजय शर्मा,मुकेश रोहिल,संदीप कुमार,रविंदर कुमार का योगदान सराहनीय था |
अखबार में 
प्रस्तुति:- इमली इको क्लब रा.व.मा.वि.अलाहर,जिला यमुना नगर हरियाणा
द्वारा--दर्शन लाल बवेजा(विज्ञान अध्यापक)

1 टिप्पणी:

दर्शन लाल बवेजा ने कहा…

प्रोफेसर त्रिवेदी की क़िताब में हैं एड्स-नियंत्रक पौधों के ब्यौरे

यूं तो पहले भी दावा होता रहा है कि एड्स जैसी खतरनाक बीमारी के खिलाफ प्रकृति में मौजूद जड़ी-बूटियां कारगर हथियार हो सकती हैं। अब इस दावे को मजबूत वैज्ञानिक जमीन देने की कोशिश हो रही है। कुछ दिनों पूर्व मेडिसनल प्लांट शीर्षक से लिखी किताब में बाकायदा उन पेड़-पौधों का ब्योरा दिया गया है जो एड्स के इलाज में मदद कर सकते हैं। पुस्तक के लेखक हैं-बॉटनी विषय में सवा सौ से अधिक किताब लिखकर रिकार्ड बनाने वाले डीडीयू गोरखपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. पी.सी. त्रिवेदी। राजस्थान विश्वविद्यालय में तैनाती केदौरान किताब लिखने वाले प्रो. त्रिवेदी ने अब एंटी एड्स प्लांट यानी कि वनस्पतियों को लेकर गोरखपुर में भी काम करना शुरू कर दिया है। विश्वविद्यालय की कार्यशालाओं व विशेषज्ञ व्याख्यानों में ऐसी वनस्पतियों ने अपनी जगह भी बनानी शुरू कर दी है।
एड्स के वायरस की वृद्धि को रोककर इम्युनिटी सिस्टम को सही करने के लिए अब आम दिनचर्या में इन वनस्पतियों के सेवन को बढ़ावा देने की योजना परवान चढ़ रही है। कहा जा रहा है कि सिंथेटिक दवाओं के विकल्प के रूप में इन वनस्पतियों से दवा व वैक्सीन बनाने का कार्य चल रहा है। इस कोशिश के कई चरणों के रिजल्ट भी बेहतर आने की बात कही जा रही है। जिससे उत्साहित होकर इन वनस्पतियों का आमतौर पर सेवन की वकालत शुरू की गयी है, ताकि मनुष्य केअंदर रिट्रो वायरस, जेनेटिक मैटेरियल पर कब्जा कर अपनी संख्या में वृद्धि न कर सके। चूंकि वायरस किसी भी कोशिका में जाकर जेनेटिक मैटेरियल को प्रभावित कर रोग प्रतिरोधक क्षमता समाप्त करने लगता है, ऐसे में एंटी रिट्रो वायरस के जरिए कोशिकाओं की सुरक्षा एकमात्र उपाय है।

किन वनस्पतियों से है उम्मीद
एंटी रिट्रो वायरस प्रापर्टी वाली वनस्पतियों में अश्वगंधा, एलोवेरा, हल्दी, जिनसिंग, मिलिविलो, काली तुलसी, लेमन ग्रास आदि को प्रमुखता दी गयी है। इन वनस्पतियों के गुण रसायनों के सहारे बनायी गयी सिंथेटिक दवाओं से कई गुना अधिक हैं। सिंथेटिक दवाओं के तमाम अवयव जहां शरीर से किन्हीं न किन्हीं रूप में बाहर हो जाते हैं, वहीं वनस्पतियां सौ फीसदी शरीर में एब्जार्व होती हैं और इसका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता है।

एंटी-एड्स प्लांट में हैं अपार संभावनाएं- प्रो. त्रिवेदी
इस संबंध में कुलपति प्रो. पीसी त्रिवेदी कहते हैं कि एंटी एड्स प्लांट केजरिए एड्स पर नियंत्रण की अपार संभावनाएं हैं। शोधों व अन्य प्रमाणों के आधार पर उन्होंने मेडिसनल प्लांट पुस्तक में एक चैप्टर में इन वनस्पतियों का उल्लेख किया है। शोध भी हो रहे हैं और कई फेज में रिजल्ट उत्साहजनक भी हैं। दवा व वैक्सीन तो अलग बात है, यदि इन वनस्पतियों का प्रयोग सामान्य रूप में ही किया जाय तो शरीर का डिफेंस सिस्टम बिगड़ने नहीं पाएगा। फिलहाल इन वनस्पतियों केप्रति यहां जागरूकता पैदा करने के प्रयास शुरू कर दिये गये हैं(अमर उजाला,गोरखपुर,23.3.11)।