बुधवार, 5 जनवरी 2011

सोख्ता गडढा बनाया गया Soakage pit for proper disposal of waste water

                     सोख्ता गडढा  बनाया गया
                          Soakage pit for proper disposal of waste water
                               (जनवरी 2011 की क्लब गतिविधि)     
हैंडपम्प,पानी पीने की जगह पर शुद्ध जल की एक बड़ी मात्रा बेकार जाती है जो की नाली में बह  जाती है या फिर वहीँ आस पास एकत्र हो कर कीचड बनाती है इन स्रोतों के पास जल एकत्र होता रहता है जो मच्छरों को खुला निमंत्रण देता है जिस कारण बीमारियाँ फैलती है
क्लब सदस्यों ने विद्यालय में ये ही समस्या देखी और फैसला लिया के जल पीने के स्थान पर एक सोख्ता गड्ढा बनाया जाएगा |
आओ जाने सोख्ता गड्ढा  क्या होता है ?
1mx1mx1m का एक गड्ढा जो की बेकार हुए शुद्ध जल को पुनः भूमि के भीतर पहुंचाने का कार्य करता है
इस को घरों में भी बनाया जा सकता है|
यह सोख्ता गड्ढा हैण्डपम्पो के पास बनाया जाए तो बहुत लाभ होता है |
बनाने की विधि:-निम्न बिंदुओं के अनुरूप कार्य कर के हम इसको बना सकते है|
1.सोख्ता गडढा वहीँ बनायें जहाँ पानी वेस्ट होता हो |
soakage_pit-1 soakage_pit-2
2. सोख्ता गडढा  की लम्बाई,चोड़ाई और गहराई =1मीx1मीx1मी  
3.इस् गड्ढे के बीचो बीच 6इंच व्यास  का 15 फीट का बोर करें(उपर के दो चित्र)
soakage_pit-3 IMG_3592 soakage_pit-5
4.अब इस् बोर में पिल्ली ईंटों (नरम ईंटों) की रोड़ी भरें|
5.अब नीचे 1/4 भाग में 5इंचx6इंच साईज़ के ईंटों के टुकड़े,फिर1/4 भाग में 4इंचx5इंच साईज़ के ईंटों के टुकड़े भर देते है| (उपर के तीन चित्र)
soakage_pit-6 soakage_pit-7
6.शेष 1/4 भाग में बजरी (2इंचx2इंच साईज़) भर देते है|
7.अब 6 इंच की एक परत मोटे रेत की बना देते है|(उपर के दो चित्र)
8.एक मिट्टी का घड़ा या पलास्टिक का डिब्बा लेकर उस में सुराख कर देते है फिट उस में नारियल की जटाएं या सुतली जूट भर देते है यह इसलिए कि पानी के साथ आने वाला ठोस गंद उपर ही रह जाएगा और कभी कभी सफाई करने के लिए भी सुविधा हो जाएगी
soakage_pit-8 soakage_pit-9
9.अब निकास नाली को इस घड़े या डिब्बे के साथ जोड़ देते है वेस्ट पानी इस में सबसे पहले आएगा|   
10.खाली बोरी से गड्ढे को ढक देते है|
11.बोरी के उपर मिट्टी डाल कर गड्ढे को ईंटों से बंद कर देते है|
12.अब तैयार हो गया सोख्ता गड्ढा(उपर के तीन चित्र)
soakage_pit-13     soakage_pit-12
अब यह गड्ढा प्रतिदिन लगभग 200 लीटर बेकार पानी को 5-6 सालों तक सोख्ता रहेगा|कक्षा दशम के छात्र दिलबाग सिंह ,योगेश ,अक्षय ,गुरदीप व साथीयों ने बनाया |
soakage_pit-14   नोट : गड्ढे की गहराई एक मीटर से कम ना हो क्यूँकी 0.9 मीटर तक जमीन में एरोबिक जीवाणु aerobic bacteria होते है ये जीवाणु वेस्ट पानी के कार्बनिक पदार्थों का विघटन करते है और पानी को स्वच्छ करते है |
गड्ढे की लम्बाई चोड़ाई बडाई जा सकती है पर गहरी 1मी. से अधिक ना हो क्यूँकी एरोबिक जीवाणु 0.9 मी.से नीचे वायु के आभाव में जीवित नहीं रहते और तब जीवाणु द्वारा होने वाली प्रक्रिया नहीं हो पाती और गन्दा जल ही जमीन में चला जाएगा|
 

प्रस्तुति:- इमली इको क्लब रा.व.मा.वि.अलाहर जिला,यमुना नगर हरियाणा  
द्वारा--दर्शन लाल बवेजा(विज्ञान अध्यापक)

4 टिप्‍पणियां:

Ravinder Verma ने कहा…

bahut acchha kaam... aapko mera slaam.. par ek baat ke jo 15 feet ka bor hai usme lohe ka pipe dalna hai 15 feet tak ? or bor karne ke bbad usko aise hi chod dena hai kahin usme mitti chali gayi ya ganda paani ssedha chla\gya to

दर्शन लाल बवेजा ने कहा…

रविंदर जी
धन्यवाद
15 फुट के बोर में कोई भी पाईप नहीं डालना है उस में पिल्ली ईंटों की रोड़ी डालनी है गन्दा पानी सीधा नहीं जाएगा
पानी उपर से फिल्टर हो कर आ रहा है तीन लेयर्स है रोड़े,बजरी,रेत बाकी काम जीवाणु का
18(3+15) फुट तक पानी हम ने भेजा और भूमिगत जल स्तर तक जो कि 80-90 फुट नीचें है वहां तक जाते जाते पानी बिलकुल छन जाएगा
ये तरीका एक दम जांचा परखा है
इस विधि से पानी इधर उधर नहीं फैलता,कीचड,मच्छर से बचाव हो जाता है
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यह भी देखें
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विज्ञान पहेली -5

दर्शन लाल बवेजा ने कहा…

फल-सब्ज़ी पर रंग-रोगन

फल-सब्जियों में प्रतिबंधित कीटनाशकों के इस्तेमाल पर दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र और दिल्ली सरकार को फटकार लगा कर लोगों की सेहत के प्रति अपनी संवेदनशीलता का परिचय दिया है। पर यह इंतहा ही है कि पेट भरने के लिए लोग जिन फलों, सब्जियों, दूध और अनाजों पर निर्भर हैं, उनमें मिलावट और उनकी खेती में खतरनाक कीटनाशकों के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए कोर्ट को आगे आना पड़ रहा है। अभी यह मामला एक आरटीआई कार्यकर्ता के आवेदन से प्रकाश में आया, जिससे पता चला कि फलों को कृत्रिम तरीके से पकाने और साग-सब्जियों की पैदावार बढ़ाने में प्रतिबंधित कीटनाशकों के प्रयोग की रोकथाम करने वाला विभाग इस बारे में लापरवाही बरत रहा है।

मंडियों में फल-सब्जियों के सैंपल लेने और जांच में गड़बड़ी पाने पर दोषियों को पकड़ने का जिम्मा दिल्ली सरकार के प्रिवेंशन ऑफ फूड एडल्टरेशन (पीएफए) डिपार्टमेंट का है। पर इस विभाग ने पिछले तीन साल में दिल्ली की मंडियों में जाकर एक भी सैंपल नहीं लिया। अगर सरकार को आम जनता की सेहत की जरा भी फिक्र होती, तो क्या पीएफए ऐसा कर सकता था? नियम यह है कि पीएफए के फूड इंस्पेक्टर पूरे साल ऐसे सैंपल लें और नियमित जांच में अगर उन्हें कोई गड़बड़ी मिलती है तो इलाके के एसडीएम के साथ मिलकर ऐक्शन लें। कानून उन्हें ऐसे फल-सब्जी बेचने वालों की दुकानें बंद कराने और जिन इलाकों से ये चीजें मंडी में आ रही हैं, वहां जाकर असली दोषियों को पकड़ने का अधिकार देता है।

व्यवस्था यह भी है कि फल-सब्जियों की जांच रिपोर्ट एक निश्चित अंतराल पर दिल्ली के गवर्नर को भी भेजी जाए। लेकिन जिस तरह नीचे से ऊपर तक हर कोई इस मामले से बेखबर बना हुआ था उसमें ज्यादा संभावना यही दिखती है कि यह अनदेखी जानबूझकर की जा रही थी। वरना सैंपल लेने, जांच करने, रिपोर्ट लिखने और उसे पाने वाले महकमों और उनके अधिकारियों में से कोई तो इस बारे में पूछता कि इतने दिनों में फल-सब्जियों की जांच की कोई सूचना क्यों नहीं आई? कोर्ट के निदेर्श के बाद संबंधित विभागों और अधिकारियों के सक्रिय होने भर से कोई बात नहीं बनेगी।

जिन लोगों की निष्क्रियता की वजह से यह अंधेरगर्दी अब तक होती रही, उन्हें दंडित करना होगा। एक आम नागरिक महंगाई के इस दौर में फल-सब्जियों में कीटनाशकों का जहर होने के बारे में सवाल उठाने का जोखिम इसलिए नहीं लेता था कि कहीं उसे झोले में आई जरा सी सब्जी से भी हाथ ना धोना पड़े। लेकिन उसका यह डर उसकी सेहत पर भारी पड़ रहा है। फल-सब्जियों में मौजूद कीटनाशकलोगों के किडनी और लीवर खराब कर रहे हैं। आज जिस तरह ग्लोबल मार्केट में अपने हरे-भरे उत्पादों की जगह बनाने के लिए हम कड़े पश्चिमी मानकों का सामना करने के लिए तैयार हैं, वैसी ही चौकसी हमें अपनी मंडियों में बिक रहे कद्दू-लौकी और सेब-संतरे के लिए भी बरतनी होगी(संपादकीय,नवभारत टाईम्स,दिल्ली,11.3.11)।

बेनामी ने कहा…

चैतन्यता की निरन्तरता के लिए दिव्य-संकल्प लें :
१. एक परिवार एक पौधा लगाये, उनका पुत्र एवं प्रपौत्र एवं पुत्री, पौत्री, प्रपोत्री के समान पालकर बडा करें।
२. घर के आसपास कान्क्रीट के जंगल न लगाये, खुली धरती माँ को छोडें।
३. हफ्ते में एक दिन वाहनों का उपयोग न करें।
४. पानी का अपव्यय रोकें।
५. प्लास्टिक की थैलियों का उपयोग कदापि न करें और हो सके तो उपयोग कराने से रोकें।
६. पब्लिक वाहनों से यात्रा करें (अहम्‌ भी नष्ट होगा)।
७. प्रतिदिन बिजली के उपयोग को भी कम करने के निरंतर प्रयास करें।
८. कचरा, कचरा पेटियों में ही सर्वदा डालें।
९. अपने अधिकार की मांग के साथ कर्त्तव्यों का पालन निष्ठा से करें।